नई दिल्ली, बिलकिस बानो सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के मामले में 11 दोषियों की रिहा करने के गुजरात सरकार के फैसले पर अब पुनर्विचार होगा। गुजरात दंगों में हुए इस घृणित अपराध पर माफी के फैसले को पलटने संबंधी याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सहमति दे दी है। 


भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमणा ने इस मामले पर फिर से विचार करने पर अपनी सहमति तब दी जब अधिवक्ता अपर्णा भट ने इस मामले को बुधवार को अविलंब सूचीबद्ध करने को कहा है। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इस मामले का मेंशन करते हुए कहा कि हम माफी दिए जाने को चुनौती दे रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नहीं दे रहे। हम उन सिद्धांतों को चुनौती दे रहे हैं जिसके आधार पर एक मुस्लिम गर्भवती महिला से सामूहिक दुष्कर्म और उसकी तीन साल की बेटी समेत परिवार के सात लोगों की हत्या करने के 11 दोषियों को माफी दी गई। उन्होंने इन सभी दोषियों को फिर से गिरफ्तार करने की मांग की है।

गुजरात सरकार के फैसले के खिलाफ याचिका दायर करने वालों में माकपा नेता सुभाषिनी अली, पत्रकार रेवती लाल और सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा शामिल हैं। याचिका में कहा गया है। कि माफी देते हुए यह कहीं नहीं बताया गया कि देश की किस नीति और सिद्धांत के तहत इतने घृणित अपराध के दोषियों की माफी के लिए चुना गया है। तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इस रिहाई के खिलाफ अलग से एक याचिका दायर की है। इससे पूर्व, 19 अगस्त को तेलंगाना की एमएलसी के. कविता ने भी चीफ जस्टिस एनवी रमणा को इस मामले में दखल देने के लिए पत्र लिखा था। पिछले सोमवार को गुजरात के पंचमहल प्रशासन ने 2008 में दोषी साबित होकर गोधरा की जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे 11 दोषियों को काटी गई उनकी लंबी सजा और जेल में उनके अच्छे बर्ताव को देखते हुए बाकी की सजा माफ कर उन्हें जेल से रिहा कर दिया था। गुजरात सरकार की माफी देने की नीति के तहत लिए गए विवादित फैसले के बाद देश में यह चर्चा छिड़ गई है कि क्या घृणित अपराधों में माफी देने की नीति उचित है? इन दोषियों ने 15 सालों से अधिक का समय में जेल में बिताया है। 

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